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Thursday, August 6, 2020

क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में विकास धीमी गति से होता है? संसदीय कामकाज की प्रक्रिया में इस यक्ष प्रश्न का उत्तर https://ift.tt/33yw4DF

पुरानी बहस को शशि थरूर ने पुनर्जीवित किया है कि देश के लिए ‘प्रेसीडेंशियल सिस्टम’ सबसे प्रासंगिक है। कभी एस. निहाल सिंह ने लिखा था कि इंदिरा गांधी, फ्रांसीसी ‘प्रेसीडेंशियल सिस्टम’ पसंद करती हैं। 1969 में श्रीमती गांधी व जगजीवन बाबू (कांग्रेस अध्यक्ष) ने ‘कमिटेड ब्यूरोक्रेसी’ की चर्चा शुरू की। फिर ‘कमिटेड न्यायपालिका’ की बात चली। जब 1975 के आसपास देश के तीन सबसे वरिष्ठ जजों को ‘इग्नोर’ कर, ए.एन. रे देश के मुख्य न्यायाधीश बने।

इस संदर्भ में 2014 की बात याद आई। ससंदीय रक्षा समिति की बैठक थी। सुर्खियों में छाई चीन की एक खबर का प्रसंग उठा। एक वरिष्ठ मंत्री रहे (अब विपक्ष) सांसद का जवाब था, चीन में एक पार्टी की साम्यवादी व्यवस्था है। हमारा सिस्टम लोकतांत्रिक है। आशय साफ था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विकास की प्रक्रिया धीमी है। मैं संसदीय कामकाज की प्रक्रिया में इस यक्ष सवाल का उत्तर ढूंढने लगा। कैसे?

सड़क दुर्घटनाओं का प्रसंग संसद में उठता था। उदारीकरण के पहले भारत में कुल रजिस्टर्ड वाहन थे, 1.48 करोड़ (1988)। 2016 में हो गए 21.83 करोड़। दुर्घटनाएं भी बढ़ीं। 2016 में लोकसभा में इसे रोकने के लिए बिल पेश हुआ। ‘मोटर व्हीकल्स एक्ट’ बना था, 1988 में, पास हो सका 2019 में। 31 वर्षों बाद। 2008 से जनवरी 2018 तक भारत में 15,34,270 लोग, 48 लाख सड़क दुर्घटनाओं में मरे। ‘इस्टोनिया’ देश के बराबर की भारतीय आबादी असमय मरी।

सदन में सुनता था, खाद्यान्न में मिलावटों से जनप्रतिनिधि बेचैन हैं। मिलावट से बीमारियों का जिक्र होता। पाया गया कि यह कानून ‘द प्रिवेंशन ऑफ फूड एडलटेरेशन एक्ट’ 1954 में बना था। 64 वर्षों बाद (2018 में) बदला। आजादी के बाद ही भ्रष्टाचार का काला साया दिल्ली में पसरने लगा। लोक दबाव में 1968 में इसे रोकने के लिए ‘लोकपाल बिल’ लोकसभा में पेश हुआ। अंततः कानून मार्च 2019 में अस्तित्व में आया। उदारीकरण के बाद चिटफंड कंपनियों की जालसाजी की बाढ़ आ गई। पर कानून बना 2019 में, 37 वर्षों बाद। भ्रष्टाचार के मुद्दों पर सरकारें बदलती रहीं। लोक दबाव में, 1988 में ‘बेनामी ट्रांजेक्शन (प्रोहिबिशन) एक्ट’ बना, जिसमें सजा का प्रावधान नहीं था। फिर संशोधित कानून आया, 28 वर्ष बाद, 2016 में।

2014 में लोकसभा में ‘इलेक्ट्रिसिटी (एमेंडमेंट) बिल’ आया। चोरी, खराब मीटर वगैरह में सुधार के लिए। कमिटी की छानबीन के बाद (2015) पास नहीं हुआ। अंततः 2018 में पास हुआ। जनवरी 2019 में ऊर्जा मंत्री ने संसद को बताया कि 1% ट्रांसमिशन, ड्रिस्टीब्यूशन नुकसान कम करने से 4146.60 करोड़ की बचत होगी। 2016-17 में यह नुकसान 21.42% था। देश ने उस वर्ष 88,820 करोड़ गंवाए। यानी रु. 10 करोड़ प्रति घंटा। ‘द इनसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ (2016) जैसे कानूनों के अभाव में देश के बैंक आर्थिक रूप से खोखले होते रहे। पर कानून बना, 2014 के बाद। राज्यसभा में अक्टूबर 2019 में अनेक पुराने बिलों का निष्पादन हुआ। मसलन ‘द इंडियन मेडिकल काउंसिल (एमेंडमेंट) बिल 1987’ (31 वर्ष), ‘द कांस्टिट्यूशन (79 एमेंडमेंट) बिल’ (26 वर्ष) वगैरह। यही स्थिति ‘रेरा कानून (2016)’ की है। यह 1950 बनना चाहिए था। रियल स्टेट, ब्लैकमनी का पर्याय बन गया।

अब सवाल है कि यह विलंब क्यों? इसी पहेली में था, समाधान। साम्यवादी व्यवस्था से असंख्य गुना श्रेष्ठ है, लोकतंत्र। कारण, वहां निर्णय थोपते हैं, यहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। अगर चीजों का निबटारा-निष्पादन समयबद्ध होने लगे, तो लोकतांत्रिक सिस्टम में प्रगति और तेज होगी। केंद्र से लेकर राज्यों तक पुराने अप्रासंगिक कानून हटें, इसमें अहम भूमिका विधायिका की है। इस मूल धर्म निर्वाह के लिए शायद ही वॉकआउट या शोर-शराबा होता है।

बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद आईबीसी कोड (2014) बनता, तो क्या बैंक लूट की घटनाएं होतीं? आजादी के बाद भ्रष्टाचार के कई मामलों की परत जब फिरोज गांधी खोल रहे थे, तब सख्त कानून बनना जरूरी था। फिर 2014 के बाद 3 लाख से अधिक शेल कंपनियां रहतीं? 1500 से अधिक पुराने कानून, 2019 तक संसद ने खत्म किए हैं। कोई इस विषय पर शोध करे कि कानूनों में विलंब की क्या आर्थिक-सामाजिक कीमत देश ने चुकाई है? इसके निष्कर्षों से संसदीय राजनीति में बदलाव की नई चेतना पैदा होगी। देश की जनता (महापंचायत), हर सांसद या विधायक से हिसाब मांगे कि आपने संसद या विधानसभाओं में क्या प्रासंगिक कानून बनाए, जो मौजूदा चुनौतियों का हल हैं? गवर्नेंस में कहां-कहां सुधार हुए? आपके काम की बैलेंसशीट क्या है?

इंसान पाषाण युग से लाखों वर्षों बाद खेती युग में आया। फिर लंबे अंतराल बाद औद्योगिक क्रांति हुई। फिर सूचना क्रांति। जेट गति से बदलाव शुरू हुआ। हजारों वर्षों में जो बदलाव हो रहे थे, चंद वर्षों में होने लगे। पर कानूनी बदलाव कृषि युग मानस से चलेगा, तो आधुनिक दुनिया और प्रगति से कैसे तालमेल बनेगा? (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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बिहार से राज्यसभा सांसद


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